भारत के प्रमुख जलाशयों में पानी का भंडार 10 साल के औसत से नीचे, दक्षिण भारत में विशेष चिंता

भारत के प्रमुख जलाशयों में पानी का भंडार 10 साल के औसत से नीचे, दक्षिण भारत में विशेष चिंता

VoS NEWS DESK | INDIA | 30 सितंबर 2026

भारत में मानसून का मौसम समाप्ति की ओर है और इसी समय जलाशयों में पानी की स्थिति को लेकर चिंता सामने आई है। देश के प्रमुख जलाशय सिंचाई, पेयजल और बिजली उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण हैं, इसलिए इनमें पानी की मात्रा सीधे तौर पर कई क्षेत्रों की आगामी जरूरतों को प्रभावित कर सकती है।

केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के अनुसार 28 सितंबर तक 178 प्रमुख जलाशयों में पानी का भंडारण कुल क्षमता का लगभग 70 प्रतिशत था। यह पिछले दस वर्षों के औसत लगभग 76.62 प्रतिशत से नीचे है। पिछले वर्ष इसी अवधि में इन जलाशयों में भंडारण लगभग 79 प्रतिशत बताया गया था।

दक्षिण भारत में स्थिति अधिक कमजोर दिखाई दी। क्षेत्र के 92 प्रमुख जलाशयों में भंडारण लगभग 50 प्रतिशत क्षमता तक रहा, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह लगभग 87 प्रतिशत था। आंकड़ों के अनुसार दक्षिण भारत में बारिश भी सामान्य स्तर से कम रही है।

जलाशयों में पानी का स्तर कम होने का असर सबसे पहले कृषि क्षेत्र पर पड़ सकता है। भारत के कई राज्यों में सिंचाई के लिए बांधों और जलाशयों से पानी उपलब्ध कराया जाता है। यदि जलाशयों में पर्याप्त पानी नहीं रहता, तो रबी फसलों के लिए सिंचाई की योजना बनाना अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

पेयजल आपूर्ति भी इससे जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा है। कई शहर और कस्बे जलाशयों, बांधों तथा सतही जल स्रोतों पर निर्भर हैं। कम भंडारण की स्थिति में स्थानीय प्रशासन को पानी के वितरण और उपयोग को लेकर अतिरिक्त प्रबंधन करना पड़ सकता है।

जलाशयों का एक अन्य महत्वपूर्ण उपयोग बिजली उत्पादन है। भारत में कई हाइड्रोपावर परियोजनाएं बांधों और जलाशयों पर निर्भर करती हैं। जल स्तर कम होने पर बिजली उत्पादन की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है, हालांकि इसका वास्तविक प्रभाव अलग-अलग परियोजनाओं और क्षेत्रों की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

इस वर्ष बारिश का वितरण पूरे देश में एक जैसा नहीं रहा। कुछ क्षेत्रों में भारी बारिश और बाढ़ की स्थिति बनी, जबकि अन्य इलाकों में बारिश सामान्य से कम रही। इसी असमान वितरण के कारण देश के विभिन्न हिस्सों में जल संसाधनों की स्थिति भी अलग-अलग बनी हुई है।

दक्षिण भारत के कम जल भंडारण ने विशेष ध्यान आकर्षित किया है। कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और अन्य दक्षिणी क्षेत्रों में कृषि तथा शहरी जल आपूर्ति के लिए जल संसाधनों का प्रबंधन महत्वपूर्ण है।

मानसून के अंतिम दिनों में होने वाली बारिश कुछ जलाशयों की स्थिति सुधार सकती है, लेकिन इसका प्रभाव क्षेत्र और बारिश की मात्रा पर निर्भर करेगा। मानसून के बाद लंबे शुष्क मौसम की शुरुआत होने के कारण उपलब्ध जल भंडार का सावधानीपूर्वक इस्तेमाल महत्वपूर्ण हो जाता है।

भारत में जल प्रबंधन की चुनौती केवल बारिश की मात्रा से संबंधित नहीं है। जलाशयों की क्षमता, सिंचाई की मांग, शहरीकरण, भूजल पर निर्भरता और कृषि क्षेत्र की पानी की जरूरतें भी कुल दबाव को प्रभावित करती हैं।

विशेषज्ञों द्वारा लंबे समय से जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन और सिंचाई की दक्षता बढ़ाने पर जोर दिया जाता रहा है। ऐसी परिस्थितियों में स्थानीय स्तर पर पानी के उपयोग की योजना और उपलब्ध जल संसाधनों की निगरानी महत्वपूर्ण हो जाती है।

आने वाले महीनों में राज्यों की नजर जलाशयों के वास्तविक भंडारण, सर्दियों की वर्षा और कृषि क्षेत्र की मांग पर रहेगी। यदि कुछ क्षेत्रों में पानी का स्तर पर्याप्त रूप से नहीं बढ़ता है, तो स्थानीय स्तर पर जल प्रबंधन से जुड़े फैसले अधिक महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

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प्रमुख जलाशयों में कम भंडारण भारत के लिए कृषि, पेयजल और ऊर्जा—तीनों क्षेत्रों से जुड़ा विषय है। राष्ट्रीय औसत के साथ-साथ क्षेत्रीय अंतर को देखना जरूरी है, क्योंकि दक्षिण भारत जैसे क्षेत्रों में स्थिति अलग हो सकती है। मानसून के बाद जल संसाधनों का सावधानीपूर्वक प्रबंधन महत्वपूर्ण रहेगा।

Source: Indian Express / Central Water Commission

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