हिंदी के इस्तेमाल को लेकर केरल में विवाद, महिला विधायकों ने राष्ट्रीय आयोग के कार्यक्रम का बहिष्कार किया

हिंदी के इस्तेमाल को लेकर केरल में विवाद, महिला विधायकों ने राष्ट्रीय आयोग के कार्यक्रम का बहिष्कार किया

VoS NEWS DESK | INDIA | 11 September 2026

यह विवाद 7 और 8 सितंबर को फरीदाबाद में आयोजित राष्ट्रीय महिला आयोग की दो दिवसीय कार्यशाला के दौरान सामने आया। कार्यक्रम का उद्देश्य महिला विधायकों को जेंडर रिस्पॉन्सिव गवर्नेंस और नीति निर्माण से जुड़े विषयों पर चर्चा के लिए एक मंच उपलब्ध कराना था। इसमें देश के विभिन्न राज्यों से 100 से अधिक महिला विधायक शामिल हुई थीं।

केरल की आठ UDF महिला विधायकों ने कार्यशाला का बहिष्कार किया। उनका आरोप था कि कार्यक्रम में हिंदी के इस्तेमाल के कारण गैर-हिंदी भाषी राज्यों से आने वाले प्रतिनिधियों को असुविधा हुई। विधायकों ने सवाल उठाया कि राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम में विभिन्न भाषाई पृष्ठभूमि से आने वाले प्रतिनिधियों के लिए समान और सुविधाजनक भाषा व्यवस्था क्यों नहीं की गई।

केरल में इस मुद्दे को केवल भाषा से जुड़ा विवाद नहीं माना जा रहा है, बल्कि इसे देश की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता से जोड़कर देखा जा रहा है। राज्य के नेताओं का कहना है कि भारत जैसे बहुभाषी देश में राष्ट्रीय कार्यक्रमों के दौरान सभी राज्यों और क्षेत्रों की भाषाई संवेदनशीलताओं को ध्यान में रखना आवश्यक है।

केरल के मुख्यमंत्री वी. डी. सतीशन ने भी इस मामले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रमों में भाषाई समानता और सम्मान की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत की ताकत उसकी विविधता में है और किसी एक भाषा को प्राथमिकता दिए जाने की धारणा से बचना जरूरी है।

केरल की महिला एवं बाल विकास मंत्री बिंदु कृष्णा ने भी कार्यक्रम की भाषा व्यवस्था पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अलग-अलग राज्यों से आने वाले जनप्रतिनिधियों के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रमों में उचित भाषा और अनुवाद की व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि सभी प्रतिनिधि चर्चाओं और गतिविधियों में समान रूप से भाग ले सकें।

यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब भारत में हिंदी के साथ-साथ क्षेत्रीय भाषाओं की भूमिका को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस जारी है। तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, बंगाली, मराठी, पंजाबी और कई अन्य भाषाएं भारत की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ऐसे में राष्ट्रीय संस्थानों और कार्यक्रमों में भाषा का चुनाव अक्सर संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा बन जाता है।

राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित कार्यक्रमों में भाषा की व्यवस्था केवल संवाद का विषय नहीं बल्कि प्रतिनिधित्व और भागीदारी से भी जुड़ी होती है। यदि किसी राज्य के प्रतिनिधियों को भाषा संबंधी कठिनाई होती है, तो इससे कार्यक्रम में उनकी सक्रिय भागीदारी प्रभावित हो सकती है। इसी कारण ऐसे आयोजनों में अनुवाद और बहुभाषी सुविधाओं की मांग लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है।

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केरल का यह विवाद भारत की भाषाई विविधता और राष्ट्रीय स्तर के प्रशासनिक कार्यक्रमों के बीच संतुलन की चुनौती को सामने लाता है। बहुभाषी या प्रभावी अनुवाद व्यवस्था अपनाने से विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों को समान भागीदारी का अवसर मिल सकता है और भविष्य में इस तरह के विवादों को कम किया जा सकता है। यह मामला केंद्र और राज्यों के बीच भाषा नीति को लेकर जारी व्यापक बहस को भी नई दिशा दे सकता है।

Source: The Indian Express • National Commission for Women (NCW)

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