दिल्ली हाईकोर्ट में समान-लैंगिक पार्टनर के मेडिकल फैसलों पर केंद्र का रुख, अधिकृत होने पर निर्णय लेने की बात

दिल्ली हाईकोर्ट में समान-लैंगिक पार्टनर के मेडिकल फैसलों पर केंद्र का रुख, अधिकृत होने पर निर्णय लेने की बात

VoS NEWS DESK | LAW | 20 September 2026

केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष अपना जवाब दाखिल किया। मंत्रालय ने कहा कि मौजूदा कानूनी व्यवस्था में एक सक्षम वयस्क किसी व्यक्ति को अपनी ओर से मेडिकल निर्णय लेने के लिए अधिकृत कर सकता है, यदि बाद में वह व्यक्ति स्वयं निर्णय लेने की स्थिति में न रहे।

यह मामला एक समान-लैंगिक दंपति की याचिका के बाद सामने आया, जिन्होंने मेडिकल उपचार या आपात स्थिति में एक-दूसरे के लिए मेडिकल प्रतिनिधि के रूप में कार्य करने के अधिकार को मान्यता देने की मांग की थी। याचिकाकर्ताओं ने कहा था कि गैर-विषमलैंगिक दंपतियों के लिए इस प्रकार की मेडिकल प्रतिनिधित्व व्यवस्था को स्पष्ट रूप से मान्यता देने वाला पर्याप्त ढांचा मौजूद नहीं है।

केंद्र ने अपने जवाब में कहा कि मेडिकल प्रतिनिधि केवल रक्त संबंधी व्यक्ति या “spouse” तक सीमित होना आवश्यक नहीं है। मंत्रालय ने Mental Healthcare Act, 2017 सहित मौजूदा कानूनी प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि मेडिकल प्रतिनिधि किसी अन्य व्यक्ति को भी बनाया जा सकता है, बशर्ते लागू कानून और आवश्यक सुरक्षा उपायों का पालन हो।

सरकार के अनुसार यदि किसी सक्षम वयस्क ने पहले से अपने पार्टनर को अपनी ओर से निर्णय लेने के लिए नामित या अधिकृत किया है और बाद में वह व्यक्ति निर्णय लेने में असमर्थ हो जाता है, तो केवल पार्टनर के सेक्स, जेंडर या यौन अभिविन्यास के आधार पर उसे मेडिकल निर्णय प्रक्रिया से बाहर करने का कोई मेडिकल या नैतिक आधार दिखाई नहीं देता।

हालांकि, केंद्र ने मेडिकल निर्णय लेने के अधिकार और विवाह की कानूनी मान्यता के बीच अंतर भी स्पष्ट किया है। मंत्रालय ने कहा कि भारतीय विवाह कानूनों के तहत “spouse” शब्द की मौजूदा कानूनी स्थिति अलग है और इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के 2023 के फैसले का भी उल्लेख किया गया।

इसका अर्थ यह है कि सरकार का वर्तमान रुख मेडिकल प्रतिनिधित्व के संदर्भ में है और इसे समान-लैंगिक विवाह की कानूनी मान्यता के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है। मेडिकल निर्णय लेने के लिए किसी व्यक्ति को अधिकृत करने का प्रश्न अलग कानूनी ढांचे में देखा जा रहा है।

केंद्र ने अपने जवाब में कुछ अन्य प्रशासनिक उदाहरणों का भी उल्लेख किया। इनमें समान-लैंगिक दंपतियों के संयुक्त बैंक खाते खोलने पर रोक नहीं होने और राशन कार्ड के लिए उन्हें एक ही परिवार या घरेलू इकाई के रूप में मानने से जुड़े प्रशासनिक प्रावधान शामिल हैं।

17 सितंबर को दिल्ली हाईकोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि केंद्र का जवाब अदालत के समक्ष औपचारिक रूप से रखे जाने से पहले मीडिया तक कैसे पहुंचा। अदालत की कार्यवाही इस मामले में केंद्र के जवाब और याचिका में उठाए गए कानूनी मुद्दों के संदर्भ में आगे बढ़ रही है।

मामले का अगला कानूनी चरण इस बात से संबंधित होगा कि अदालत मौजूदा कानूनों और केंद्र के जवाब को किस प्रकार देखती है तथा मेडिकल प्रतिनिधित्व और मरीज की पूर्व अनुमति से जुड़े प्रश्नों पर क्या दिशा-निर्देश सामने आते हैं।

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दिल्ली हाईकोर्ट का यह मामला मुख्य रूप से मरीज की स्वायत्तता, पूर्व अनुमति और मेडिकल प्रतिनिधित्व से जुड़े कानूनी प्रश्नों पर केंद्रित है। केंद्र के जवाब में यह कहा गया है कि यदि किसी सक्षम वयस्क ने किसी पार्टनर को अधिकृत किया है, तो केवल उसके सेक्स, जेंडर या यौन अभिविन्यास के आधार पर उसे मेडिकल निर्णय प्रक्रिया से बाहर नहीं किया जाना चाहिए।

साथ ही, केंद्र ने मेडिकल प्रतिनिधि के रूप में किसी पार्टनर को अधिकृत करने और समान-लैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने के मुद्दों को अलग-अलग बताया है। इसलिए मामले का दायरा मेडिकल निर्णय लेने के अधिकार और मौजूदा कानूनी सुरक्षा उपायों तक सीमित है।

दिल्ली हाईकोर्ट की आगे की सुनवाई में यह तय होना बाकी है कि मौजूदा कानूनी व्यवस्था इन परिस्थितियों में किस प्रकार लागू होगी और अधिकृत पार्टनर की भूमिका के संबंध में अदालत क्या दिशा तय करती है।

Source: The Indian Express; LawBeat; LiveLaw.

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