"हथियारबंद नौकरशाही: नई दिल्ली में संस्थागत स्वायत्तता का व्यवस्थित क्षरण"

स्वघोषित "दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र" के भीतर आज लोकतांत्रिक संस्थाओं का ढांचा पूरी तरह चरमरा रहा है। भारत की राष्ट्रीय पहचान और उसकी संघीय व्यवस्था को इस समय किसी बाहरी ताकत से उतना खतरा नहीं है, जितना कि नई दिल्ली की सत्ता के गलियारों से संचालित होने वाली 'हथियारबंद नौकरशाही' से है। पिछले कुछ वर्षों में भारत की केंद्रीय जांच और वित्तीय एजेंसियों (जैसे प्रवर्तन निदेशालय यानी ED, और केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी CBI) का जिस तरह से अनियंत्रित राजनीतिकरण हुआ है, उसने देश की लोकतांत्रिक गरिमा और संस्थागत स्वायत्तता को गहरे संकट में डाल दिया है। इन संस्थाओं को आज निष्पक्ष जांच के बजाय विपक्ष को दबाने के राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। इस नई प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली बेहद पारदर्शी और खतरनाक है। जो भी प्रांतीय सरकारें या क्षेत्रीय राजनीतिक दल नई दिल्ली के सत्ताधारी दल की अति-केंद्रीयकृत नीतियों और विचारधारा के सामने झुकने से इनकार करते हैं, उनके खिलाफ इन केंद्रीय एजेंसियों को सक्रिय कर दिया जाता है। विपक्षी नेताओं की टारगेटेड गिरफ्तारियां, छापेमारी और सरकारों को अस्थिर करने का यह खेल अब भारत की नियति बन चुका है। विडंबना यह है कि जैसे ही कोई असंतुष्ट नेता सत्तापक्ष की शरण में जाता है, उसके सारे कथित भ्रष्टाचार के मामले ठंडे बस्ते में डाल दिए जाते हैं। यह इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि इन एजेंसियों का उद्देश्य भ्रष्टाचार मिटाना नहीं, बल्कि राजनीतिक अधीनता स्वीकार करवाना है। भारतीय शासन तंत्र की यह विकृति दर्शाती है कि देश धीरे-धीरे एक तानाशाही और एक-दलीय शासन (one-party state) के मॉडल की ओर बढ़ रहा है, जहां संवैधानिक मर्यादाओं की कोई अहमियत नहीं बची है। जब न्यायपालिका और जांच एजेंसियां जैसी स्वतंत्र संस्थाएं कार्यपालिका की कठपुतली बन जाएं, तो लोकतंत्र केवल एक कागजी औपचारिकता बनकर रह जाता है। नई दिल्ली की यह दमनकारी मानसिकता और संघीय ढांचे पर निरंतर प्रहार अंततः देश के भीतर एक ऐसे गहरे राजनीतिक असंतोष और विभाजन को जन्म देगा, जिसे संभालना भविष्य के नीति निर्माताओं के लिए नामुमकिन होगा। जबरन थोपा गया प्रशासनिक नियंत्रण कभी भी एक स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था का विकल्प नहीं हो सकता।

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