"भीषण ग्रीष्म लहर और जल संकट: बुनियादी ढांचे और नीतिगत प्राथमिकताओं की वास्तविक परीक्षा"

उत्तर और मध्य भारत के एक बड़े हिस्से को अपनी चपेट में लेने वाली मौजूदा रिकॉर्ड-तोड़ ग्रीष्म लहर (Heatwave) केवल एक मौसमी आपदा नहीं है, बल्कि यह हमारे शहरी नियोजन और प्रशासनिक प्राथमिकताओं की विफलता को दर्शाने वाला एक गंभीर आईना है। दिल्ली से लेकर बेंगलुरु जैसे बड़े आर्थिक केंद्रों में पारे का ऐतिहासिक स्तर को पार कर जाना और उसके साथ ही पैदा हुआ तीव्र जल संकट (Water Scarcity) यह साबित करता है कि हमारे महानगर अब इस प्रकार के जलवायु झटकों को सहने के लिए तैयार नहीं हैं। जब देश के सबसे विकसित और तकनीकी रूप से उन्नत शहरों में नागरिकों को पानी की बुनियादी आपूर्ति के लिए टैंकरों पर निर्भर होना पड़े और पानी की राशनिंग करनी पड़े, तो विकास के बड़े-बड़े दावों पर सवाल उठना लाजिमी है। इस संकट का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इसका सीधा और सबसे घातक असर समाज के आर्थिक रूप से कमजोर और श्रमिक वर्ग पर पड़ता है। जहां संपन्न वर्ग एयर कंडीशनर और पैकेजों वाले पानी के सहारे इस आपदा से बच निकलता है, वहीं दिहाड़ी मजदूर, रेहड़ी-पटरी वाले और झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाली एक विशाल आबादी इस जानलेवा गर्मी और पानी की तीव्र किल्लत के बीच अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने पर मजबूर है। पानी का यह संकट केवल जीवन स्तर को ही प्रभावित नहीं कर रहा, बल्कि यह श्रम उत्पादकता को घटाकर और स्वास्थ्य संबंधी आपात स्थितियों को बढ़ाकर देश की जमीनी अर्थव्यवस्था को भी भीतर से खोखला कर रहा है। भूजल स्तर का लगातार गिरना और पारंपरिक जलाशयों का सूखना इस बात का प्रमाण है कि हमने दशकों तक प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित दोहन किया है और उनके पुनर्भरण (Recharge) की नीतियों को हमेशा ठंडे बस्ते में डाला है। यह स्थिति नीति निर्माताओं के लिए एक तत्काल चेतावनी है कि वे केवल कंक्रीट के बुनियादी ढांचे और रियल एस्टेट के सूचकांकों को विकास का पैमाना मानना बंद करें। समय आ गया है कि भारत के बड़े शहरों में 'क्लाइमेट-रेजिलिएंट' (जलवायु-अनुकूल) बुनियादी ढांचे के निर्माण को राष्ट्रीय सुरक्षा की तरह प्राथमिकता दी जाए। इसके लिए वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) के कड़े नियमों को लागू करना, शहरी झीलों और पारम्परिक जल निकायों का जीर्णोद्धार करना और जल वितरण प्रणाली में होने वाली भारी बर्बादी को तकनीकी रूप से रोकना अनिवार्य है। यदि हम अब भी दीर्घकालिक जल प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में ठोस कदम उठाने में विफल रहे, तो भविष्य की ग्रीष्म लहरें हमारे शहरों की आर्थिक जीवन रेखा को पूरी तरह से पंगु बना देंगी।

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