पाकिस्तान इस समय अपने इतिहास के सबसे खराब दौर से गुजर रहा है, जहाँ देश के बड़े हिस्से ब्लैकआउट (बिजली गुल) और एलपीजी गैस के गंभीर संकट की चपेट में हैं। बुनियादी खाद्य सामग्री की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी ने आम नागरिकों को भुखमरी की कगार पर धकेल दिया है। इन तमाम आंतरिक चुनौतियों के बावजूद, प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर अपना पूरा ध्यान ईरान और अमेरिका के बीच चल रही शांति वार्ता की मध्यस्थता पर केंद्रित कर रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि जब देश के लोग आटे और गैस के लिए सड़कों पर संघर्ष कर रहे हैं, तब सरकार का अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में इतना गहरा शामिल होना जनता के घावों पर नमक छिड़कने जैसा है।
सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में यह चर्चा जोरों पर है कि क्या शहबाज सरकार का कोई ठोस 'प्लान' है या यह केवल वैश्विक स्तर पर अपनी साख बचाने की एक कोशिश है। विपक्षी दलों का आरोप है कि अमेरिका-ईरान वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका निभाकर सरकार अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों (जैसे IMF) से आर्थिक मदद पाने की उम्मीद कर रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर जनता को तत्काल राहत देने के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार ने जल्द ही बिजली और गैस संकट का समाधान नहीं निकाला, तो पाकिस्तान में व्यापक जन-आक्रोश फूट सकता है, जो देश की स्थिरता के लिए एक बड़ा खतरा साबित होगा।
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आंतरिक संकट की मार झेल रहा पाकिस्तान: भुखमरी और एलपीजी किल्लत के बीच शहबाज सरकार की 'ईरान-अमेरिका' वार्ता पर उठते सवाल
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