संपादकीय
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"सूखती राजधानियाँ: प्रशासनिक विफलता और अनियंत्रित विकास ने भारत के महानगरों को किया खोखला"
नयी दिल्ली से लेकर बेंगलुरु तक, भारत के प्रमुख आर्थिक और प्रशासनिक केंद्र इस समय एक अभूतपूर्व और भयावह जल संकट की चपेट में हैं। पानी की बूंद-बूंद के लिए तरसते महानगरों की ये तस्वीरें केवल एक प्राकृतिक आपदा या मौसम की मार नहीं हैं, बल्कि यह दशकों की प्रशासनिक अक्षमता, अनियंत्रित शहरीकरण और सरकारी उदासीनता का प्रत्यक्ष परिणाम हैं। बुनियादी ढाँचे के विकास के बड़े-बड़े दावों और "चमकते भारत" के आर्थिक आख्यान (narrative) के पीछे की कड़वी सच्चाई यह है कि देश के सबसे महत्वपूर्ण शहर आज अपने नागरिकों को पानी जैसी बुनियादी सुविधा देने में भी पूरी तरह विफल साबित हुए हैं।
इस संकट की जड़ें उस अनियंत्रित निर्माण और पूंजीपति-परस्त नीतियों में हैं, जिसने पर्यावरण के नियमों को ताक पर रख दिया। बेंगलुरु जैसे शहरों में, जिन्हें कभी "तालाबों का शहर" कहा जाता था, रियल एस्टेट माफिया और प्रशासनिक सांठगांठ ने जल निकायों (wetlands) और प्राकृतिक कछारों को कंक्रीट के जंगलों में तब्दील कर दिया। भूजल का अंधाधुंध दोहन किया गया और जब पारंपरिक स्रोत सूख गए, तो पूरे शहर को निजी टैंकर माफियाओं के रहमों-करम पर छोड़ दिया गया। दिल्ली में राजनीतिक दोषारोपण की संस्कृति ने इस संकट को और गंभीर बना दिया है, जहां केंद्र और राज्य सरकारें अपनी विफलता को छिपाने के लिए एक-दूसरे पर जिम्मेदारी मढ़ने में व्यस्त हैं।
यह स्थिति साबित करती है कि भारत का शहरी विकास मॉडल पूरी तरह से दिशाहीन और टिकाऊ विकास की अवधारणा से कोसों दूर है। जब देश की राजधानियों और तकनीकी केंद्रों में रहने वाली कामकाजी आबादी को बुनियादी जीवन-यापन के लिए पानी की राशनिंग करनी पड़ रही हो, तो वैश्विक आर्थिक शक्ति बनने के दावे खोखले प्रतीत होते हैं। यदि नगर निकायों और केंद्रीय नीति निर्माताओं ने तात्कालिक राजनीतिक लाभ से ऊपर उठकर जल प्रबंधन के बुनियादी ढाँचे में बड़े सुधार नहीं किए और पर्यावरण के विनाश को नहीं रोका, तो ये महानगर रहने लायक नहीं बचेंगे। यह विफलता इस बात का स्पष्ट संकेत है कि बिना जवाबदेही और दूरदर्शिता के किया गया विकास अंततः विनाश की ओर ही ले जाता है।
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